इस जड़ी की गंध से भाग जाते हैं सांप और इसके हैं अनेक फायदे

13 अगस्त दिन शुक्रवार को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाएगा। यह त्योहार हर वर्ष सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन नाग पंचमी की पूजा करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और सर्पदंश का भय नहीं रहता।

नाग पंचमी का त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। सावन मास भगवान शिव का प्रिय मास है और इस मास में भगवान शिव से संबंधित ज्यादातर त्योहार मनाए जाते हैं, जिसमें मंगला गौरी व्रत, हरियाली तीज, नागपचंमी आते हैं। सावन मास में मानसून दस्तक देता है।

बारिश शुरू होने के कारण घर में सांप-बिच्छू जैसे जीव घर में घुस आते हैं, जिससे समस्या बढ़ जाती है। हम आपको ऐसी जड़ी-बूटी के बारे में बताते हैं, जिसकी केवल महक से ही सांप भाग जाते हैं और इस जड़ी के कई और फायदे भी हैं।

इसके आसपास भी नहीं भटकते सांप- सांपों को घर से दूर भगाने के लिए सर्पगंधा नामक वनस्पति का प्रयोग किया जाता है। यह पौधा सांपों का दुश्मन माना जाता है और इसके आसपास भी सांप नहीं आते। अगर घर के आसपास इस पौधे को लगाया जाए तो सांप कभी नहीं आएंगे और सर्पदंश का भय भी नहीं रहेगा। इस पौधे न केवल सांप बल्कि अन्य विषैले जीव-जंतु भी प्रवेश नहीं करते। देहाती क्षेत्रों में सैकड़ों लोग इस पौधे का लगातार लाभ ले रहे हैं।

जानिए सर्पगंधा के फायदे- सर्पगंधा केवल सांपों को भगाने के लिए ही नहीं बल्कि हाई ब्लड प्रेशर, अनिद्रा, पागलपनव व उन्माद दैसे रोगों की अचूक दवा है। पहले इस ‘पागलों की दवा’ भी कहा जाता था, क्योंकि इसके प्रयोग से पागलपन ठीक किया जा सकता है। साथ ही यह कफ और वात को भी शांत करता है। इसके प्रयोग से पित्त बढ़ता है और भोजन में रुचि पैदा होती है। सर्पगंधा के पौधे का वर्णन चरक (1000-800 ईपू) ने संस्कृत नाम सर्पगंधा के तहत सर्पदंश तथा कीटदंश के उपचार हेतु लाभप्रद विषनाशक के रूप में किया है।

3000 साल पुराना है इतिहास- सर्पगंधा की जड़ों में रिसर्पिन नामक एल्केलाइड पाया जाता है जो हाई ब्लड प्रेशर की अचूक दवा है। इसके अलावा 26 एल्केलाइड्स और पाए जाते हैं, जो भिन्न-भिन्न रोगों के उपचार में काम आते हैं। इसकी जड़ों से बनाई जाने वाली भस्म में पोटेशियम कार्बोनेट, फास्फेट, सिलिकेट, लोहा तथा मैगनीज मौजूद होते हैं, जिनका प्रयोग दवाइयों के रूप में किया जाता है। भारत में तो इसके प्रयोग का इतिहास 3000 वर्ष पुराना है।

इन नामों से भी जाना जाता है सर्पगंधा- सर्पगंधा बरूआ, धवल, चंद्रभागा, छोटा चांद आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम रौवोल्फिया सर्पेन्टाइना है। लेकिन जानकारी के अभाव में लोग इसका लाभ नहीं ले पाते। सर्पगंधा से होम्योपैथिक दवा भी बनाई जाती है। साथ ही इस पौधे से जुड़ी कई रोचक कथाएं भी हैं। बताया जाता है कि कोबरा से लड़ने से पहले नेवला सर्पगंधा की पत्तियों का रस चूस कर जाता है। साथ ही सर्पदंश में सर्पगंधा की ताजा पीसी हुई पत्तियों को पांव के तलवे के नीचे लगाने से आराम मिलता है।

ऐसे पड़ा नाम- सर्पगंधा के नामकरण को लेकर अलग-अलग मत देखे जाते हैं। एक ऐसे ही मत के अनुसार, इस वनस्पति का नाम सर्पगंधा इसलिए पड़ा क्योंकि सांप इस वनस्पति की गंध पाकर दूर भाग जाते हैं और घर के आसपास भी नहीं रहते। वहीं दूसरे मत के अनुसार, चूंकि सर्पगंधा की जड़ें सांप की तरह लंबी और टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं इसलिए इसका नाम सर्पगंधा पड़ा है।

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